Editorial

केजरीवाल की चुनौतियां

February 13, 2015 02:33 PM

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधान सभा चुनाव में जो धमाकेदार नतीजे दिए हैं, उनकी उम्मीद शायद केजरीवाल को भी नहीं रही होगी। बस शपथ लेने की औपचारिकता बाकी है। इसी के साथ शुरू होगा उनका नया सियासी सफर। माना जा सकता है कि जबर्दस्त बहुमत के चलते केजरीवाल के समक्ष कोई कठिनाई नहीं आएगा, लेकिन ऐसा ही होगा, इस बारे में अभी गारंटी के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। सच तो यह है कि केजरीवाल की नई पारी जितनी मुश्किलों से भरी होगी, उसका अनुमान शायद वे भी नहीं लगा सकते। अगर एक-दो राज्यों के चुनाव नतीजों को छोड़ दें ज्यादातर चुनाव नतीजे ऐसे साबित हुए हैं, जिनमें किसी एक पार्टी को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिली हैं। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सपा, लोकसभा आम चुनाव में भाजपा और अब दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी की पार्टी, सभी को आशा से कहीं ज्यादा सीटें मिली हैं। जहां तक बात अरविंद केजरीवाल की है, चुनाव में भले ही उन्हें जबर्दस्त बहुमत मिला हो, लेकिन सांगठनिक स्तर पर उनकी पार्टी के ढांचे को बहुत मजबूत नहीं माना जा सकता। केजरीवाल पहले भी 49 दिन तक दिल्ली की सत्ता संभाल चुके हैं। लेकिन तब स्थितियां कुछ और थीं। उस समय उन्होंने कांग्रेस से समर्थन हासिल कर सत्ता हासिल की थी। पहली बार पार्टी बनाकर वे चुनाव लड़े थे। सियासत की दुश्वारियों का उन्हें बहुत ज्यादा तजुर्बा भी हासिल नहीं था। इसलिए उनके कुछ साथियों ने शुरू से ही उनके साथ दगाबाजी शुरू कर दी थी। लेकिन स्थितियां बिल्कुल नई हैं। अब उन्हें किसी से समर्थन लेने की दरकार नहीं है। सही बात तो यह है कि भाजपा विपक्षी पार्टी तक बनने की स्थिति में नहीं है। जाहिर है कि विधान सभा में भाजपा उनके सामने असहाय की स्थिति में है। वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती। लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर भाजपा का संगठन कमजोर नहीं है। वह सडक़ों पर मोर्चा जमाकर केजरीवाल की जमकर मुखालफत कर सकती है। केजरीवाल की सबसे बड़ी मुश्किल होगी चुनावी घोषणा पत्र के वायदे पूरे करना। सियासत में घोषणाएं करना, वायदे करना अलग बात होती है और इन्हें पूरा करना दूसरी बात। चूंकि आम आदमी की पार्टी ने जो भी घोषणाएं की हैं, वे आम आदमी के हित में हैं, इसीलिए दिल्ली के मतदाताओं ने उन्हें जबर्दस्त समर्थन भी दिया है। पिछली बार भी केजरीवाल ने जनहित में कई घोषणाएं की थीं और उन्हें इसका फायदा भी मिल रहा था। यह अलग बात है कि ये घोषणाएं सरकार के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही थीं, लेकिन थीं आम आदमी के हित में। इस बार भी केजरीवाल ने दिल्ली के अवाम से जो वायदे किए हैं, उनकी एक पूरी फेहरिस्त है, लेकिन वे इन्हें कैसे पूरे कैसे कर सकेंगे, इसका खाका शायद अभी उनके दिमाग में भी न हो। ये वायदे भले ही आम आदमी के हित में हैं, लेकिन इन्हें पूरा करते समय सरकार घाटा-मुनाफा भी देखती है। घोषणाएं करते समय भले ही केजरीवाल ने इस ओर न देखा हो, लेकिन अब उन्हें देखना होगा कि कैसे ये पूरी की जा सकती हैं। चुनावी वायदे पूरी करने में सबसे बड़ी अड़चन तो केंद्र सरकार ही साबित हो सकती है। राज्य के अधिकार क्षेत्र की जो बातें हैं भले ही केजरीवाल उन्हें पूरी कर दें, लेकिन जो वायदे राज्य के अधिकार क्षेत्र के बाहर के हैं, उन्हें पूरा कर पाना मुश्किल होगा। इसके लिए केजरीवाल को पुरानी कार्यशैली छोडक़र नए परिवेश में आना होगा। मसलन, अब उन्हें धरना-प्रदर्शन का रास्ता छोडऩा होगा। उन्हें यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि विपक्ष में रहकर तो ये हथकंडे कारगर हो सकते हैं, लेकिन अगर कोई मुख्यमंत्री इस तरह की रवैया अख्तियार करता है तो सियासत में उसे अजीब सी नजरों से देखा जाने लगता है। यह ठीक है कि केजरीवाल आम आदमी हैं, लेकिन राज्य का मुखिया बनने के बाद उन्हें पद की गरिमा का निर्वाह करना ही होगा। केजरीवाल को सियासत में ऊंच-नीच का तजुर्बा भी हासिल हो चुका है। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि विभीषण न होता तो लंका के राज का पतन भी न होता। उनके इर्द-गिर्द भी ऐसे लोग हैं, जो कब तुरुप चाल चल दें कहा नहीं जा सकता। केजरीवाल को ऐसे लोगों से गोपनीयता भी बनाकर रखनी होगी।

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