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Editorial

दिल जीत गए ओबामा

January 29, 2015 03:07 PM

संपादकीय/महावीर गोयल, लोग आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने पीछे छाप छोड़ जाते हैं। संभवत:  बराक ओबामा ऐसे ही हैं। उनका विदाई भाषण भारत के इतिहास में दर्ज रहेगा। ओबामा इस बार भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आए थे। उनकी यात्रा के समय तयशुदा असैन्य परमाणु करार समेत जो अन्य समझौते होने थे, वे तो हुए ही, गणतंत्र दिवस समारोह में निकली झांकियों और सैन्य बलों के प्रदर्शन ने भी ओबामा को काफी हद तक प्रभावित किया। वे भारत की आवभगत और साज-सज्जा से कितने प्रभावित हुए, यह सीरीफोर्ट आडिटोरियम में दिए उनके विदाई भाषण में झलकता है। मसलन, अपने कार्यकाल में दूसरी बार भारत आने वाले वे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने वाले वे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, इस सब पर उन्होंने न केवल फख्र जताया, बल्कि यह भी कहा कि यह सिलसिला कायम रहेगा। उन्होंने कहा कि दोनों देश एक-दूसरे का भरपूर सहयोग कर सकते हैं। पहली बार ओबामा ने अपने संबोधनों के जरिए भारत से जुडऩे और दिल को छूने की कोशिश की है। उन्होंने यहां के मूल्यों, भाषाई-जातिगत-धार्मिक-क्षेत्रीय विविधता, गरीबी, संघर्ष का इस तरह जिक्र किया जैसे लगा कि उन्होंने भारत को आत्मसात कर लिया है। यह दोनों देशों के बदलते रिश्तों की दास्तान ही है। उनके भाषण की दो प्रमुख बातें रहीं। पहली बात तो यह कि उन्होंने स्वामी विवेकानंद का स्मरण करते हुए कहा कि एक सदी पहले विवेकानंद जी ने अमेरिका में कहा था कि मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों और मैं यहां कह रहा हूं, मेरे भारतीय भाइयों और बहनों। दूसरी बात यह कि उन्होंने भारत और अमेरिका के परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्वयं की तुलना कर डाली। ओबामा ने बताया कि उनके पिता केन्या में ब्रिटिश फौज में कुक थे, लेकिन वे अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, ठीक उसी तरह जैसे मोदी के पिता चाय विक्रेता थे, लेकिन मोदी प्रधानमंत्री हैं। ऐसा केवल भारत और अमेरिका में ही संभव है। देखा जाए तो भारतीयों की भावनाओं को झकझोरकर ओबामा उनका दिल लूट ले गए। निश्चित रूप से वे यहां अपनी बहुत अच्छी छवि बनाकर गए हैं, दोनों देशों के बीच गहरे रिश्ते कायम करने की बात कहकर गए हैं। लेकिन यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि भावनात्मक और व्यावहारिक धरातल में बहुत अंतर होता है। अगर वास्तव में अमेरिका भारत से दोस्ताना सम्बंध चाहता है तो उसे भारत के शत्रु देशों को मदद बंद करनी होगी, अपनी विदेश नीति में परिवर्तन लाना होगा। सच तो यह है कि अगर अमेरिका एशिया महाद्वीप में पकड़ बनाना चाहता है तो उसे भारत से मैत्री करनी ही होगी, लेकिन यह मैत्री समानता के आधार पर होनी चाहिए न कि किसी दबाव में। भारत किसी भी सूरत में अपनी संप्रभुता के साथ खिलवाड़ नहीं होने देगा, यह बात अमेरिका को अच्छी तरह समझनी होगी।

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